Duḥsvapna bhī āte haiṃ

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Rājakamala Prakāśana, 2004 - Poetry - 115 pages
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अकेली अता अधिक अपना अपने अब अभी अल असम इम इस उनके उन्हें उस उसके ऊपर और कभी कर करता कविता कहीं का की एक की तरह कुछ के लिए केसी को कोई गई गए गया गंगा गिरी गुजरात गुरू गोबर चप्पल चले जब जा जाए जाता है जाती जाते हैं जाना जाने जिस जी जीवन जुगनू जैसे जो तक तना तब था थे दरभंगा दो दोनों नई नहीं नाम ने पता पर पहले पानी फिर बन बनारस बने बया बल बसे बाली बी भर भारत भी भी नहीं मत माली में में भी मैं यया यर यल यह यहीं या रहा रही रहीं रात रुपये लगता है लगा लगी लगे ले लेकिन लोग वह वि विना वे सकता है सकती सकते सवार साइकिल से हम हमारा हमारी हमें हर हवा ही हुआ हुई हुए हुम हूँ है एक है तो है यह हो होगा होता है होती होने

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