Eka dina lauṭegī laṛakī

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Rājakamala Prakāśana, 1989 - Poetry - 117 pages
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अगर अपना अपनी अपने अब अभी आत्मा आदमी आर इच्छा इस उदास उन उनकी उनके उन्हें उम उस उसका उसकी उसके उसने उससे और कभी नहीं कर करती है कहीं का कि किसी की की तरह के पास के लिए को कोई क्या गई गए गया घर चलती चुप चेहरा चौबीस छाया छोड़ जब जाएगी जाओं जाती जिम जिसे जी जैसे जो तक तुम तुम्हारे तुम्हे तो तो नहीं था थी थे दादी दिनों दुख दूर देखा देह दोस्त नहीं नहीं है नींद में ने पता नहीं पर पेम फिर बच्चे बहुत बाद बेटे भी भीतर मत मालूम मुझे में में वह यम यया यर यल यह या रहा रहे लड़कियाँ लड़कियों लड़की ले लेकिन वह उसे वादी विन वे सपने में सब साथ सारा सारे सिंक सुख से से पाले सोचा सोचेगी हर ही हुआ हुई हुए है है वह हैं हो सकता है होगा होगी होता होने

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