Gīta haṃsa: Kavi Sumitrānandana Panta. 1. saṃskaraṇa

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Lokabhāratī Prakāśana, 1969 - Poetry - 246 pages
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अपने अब अंतर आत्म आत्मा ईश्वर उर उर में एक और करता करती करते करना कला कवि क्या क्षण की कुछ के को को कर कौन गए गया गाती गायन गीत चिर चेतना जग जग जीवन जगत जगत् जड़ जन जब जाता जीवन का जो तन तन्मय तुम तुमको तुम्हीं तो दर्पण दो धरती धरा नया नयी नर नव नहीं निखिल निज नित निर्मित नूतन पग पथ पर प्यार प्रकाश प्रति प्राण प्राणों के प्रिय प्रेम प्रेरित पावक पूर्ण फिर बन बोध भय भव भाव भावना भावों भी भीतर भू पर मधु मन मनुज मानव मुक्त मुख मुझको मुझे में मैं मौन यह युग यौवन रस रहता रहा रूप रोम लगता लय वन वह विश्व वैभव शोभा सत्य सब सरल संभव संस्कृत स्पर्श स्वर स्वर्ग सा सागर सित सी सुख सृष्टि से सौन्दर्य सौरभ ह्रदय ही हूँ हृदय है हैं हो होता

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