Garībī haṭāo!

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Lokabhāratī Prakāśana, 1976 - 152 pages

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अदीब अपना अपनी अपने अब आज आप आया इस उठा उस उसका उसकी उसके उसने उसे एक और कभी कर करता करने कहानी कहीं का काम कि कि वह किया किरण किसी की तरह कुछ कृष्णा के लिए को कोई क्या गया था गयी गये घर चाय चाल जब जा जाता जाती जाने जायेगा जो तक तरफ तुम तुम्हारे तो था कि थे दिन दिया दी दे देख देखा देर दो नीचे ने ने कहा पण्डित पण्डिताइन पत्नी पर पहले पाल प्रकाश ने फिर बच्चे बच्चों बहुत बात बाद बार बाहर बीवी भी नहीं मगर माँ मुझे में मेरी मेरे मैं मैंने मोहन ठठेर यह यहाँ यही या रहा था रही थी रही है रहे राधा रिक्शा लगता लगा लगी लिया ली ले लोग लोगों वह शिवेन्द्र सकता सब समय साथ सुधा से सोहन हम हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है है कि हैं हो गया होगा होता

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