Ghanaānanda-kabitta

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Sarasvatī-Mandira, 1956 - 272 pages

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अंग अति अब इन इस उस उसे एक ऐसी ऐसे और कबित कर करके करते करने करि कहा कहाँ कहीं कहूँ का काम कारण किया किसी की कुछ कृपा के लिए कै कैसे को कोई कौन क्या क्याँ क्यों गई गए गति गया है घन घनश्रानेंद जब जल जा जाता है जाती जाते जान जाने जाय जी जु जू जो जौ तक तब तुम तू ते तें तो तौ थे दिखाई देखने नहीं नाम ने पर पर भी पै प्यारे प्रकार प्रान प्रिय प्रेम बात बिन बिना ब्रह्मा भी मति मन महा में मेरी मेरे मैं यदि यह या याँ ये रंग रस रहते हैं रहा है रही रहे रूप रोम लै वह वे श्रपने श्रानंद श्रानंदघन श्राप श्रापकी श्रीकृष्ण श्रोर श्रौर सब समय सवया सी सु सुख सुजान सुधि से सो सों हाय ही ही नहीं हुई हुए हुश्रा हू हूँ हृदय है कि हैं हो होकर होता

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