Gitika

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Contents

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13
Section 2
14
Section 3
23

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अपने इन इस उनके उर उस उसके उसी एक और कमल कर करती करने करो कवि कह कहाँ का किया किसी की कुछ के कारण के लिए केवल को कौन क्या गई गगन गया गये गीत गीतिका गीतों घन छवि जग जब जल जाता जीवन जैसे जो ज्ञान ज्योति तक तन तम तरह तुम तू तो था थी दी दूर दे देख दो नयन नयनों नव नहीं निज निरालाजी ने पथ पर पवन पार प्यार प्रकाश प्राचीन प्राण प्राणों प्रिय फिर बन बह भर भाव भी मधुर मन मिला मुख मुझे में मेरा मेरी मेरे मैं मैंने मौन यह यहाँ यही या ये रहा रही रहे रूप रे वन वसन वह विश्व वे शत श्रधिक श्रपने श्रा श्राँखों श्रानन्द श्राश्री श्रीर श्रौर संगीत संसार सकल सब समय साथ सुख सुन्दर से स्नेह स्वर हर हार ही हुई हुए हुश्रा हूँ हृदय है कि हैं हो होकर होता होती होने

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