Gurjara Jaina kaviyoṃ kī Hindī sāhitya ko dena: Jaina Gurjara Kaviyoṃ kī Hindī kavitā

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Javāhara Pustakālaya, 1976 - Hindi poetry - 346 pages
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अनेक अपनी अपने आत्मा आदि आनंदघन इन कवियों इनका इनकी इनके इस इस प्रकार इसी उपदेश उल्लेख एक एवं और कबीर कर करते करने कवि कवि की कविता कवियों की कवियों ने कहा का कारण काव्य किया है की की दृष्टि से की है कुछ कृति के लिए के साथ को गया है गीत गुजरात गुरु चौपाई छन्द जयपुर जा जी जैन गुर्जर जैन धर्म जो ज्ञान तक तथा तो था थी थे दर्शन दिया द्वारा धर्म नहीं नाम पद पर परम्परा पृ० प्रति प्रभु प्रयोग प्राप्त बावनी भक्ति भाग भाव भाषा भी मन में में भी यह या ये रचना रचनाएँ रचनाओं में रचित रस रहा है रहे राजस्थान राम रास रे वर्णन वह विभिन्न विशेष विषय श्री सं० संग्रह संस्कृति समय साहित्य स्तवन हिन्दी ही हुआ है हुई हुए है और है कि है है हैं हो होता है होती

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