Harivaṃsapurāṇa

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Bhāratīya Jānapīṭha, 1962 - Jainism - 996 pages
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अनेक अपनी अपने अर्थात् आठ आदि इन इन्द्र इस प्रकार इसलिए उत्तम उत्पन्न उन उनके उसके उसी प्रकार उसे ऊपर एक सौ एवं ऐसे ओर कर करता करते करने करनेवाले कहा का कारण कि किया की कूट के द्वारा के लिए के समान के साथ को गई गया गये गान्धार चन्द्रमा चार चारों छह जाता जिस प्रकार जो तक तथा तदनन्तर तीन तु तो था थी थे दश दिया देव दो दोनों धनुष धारण नहीं नाम नामक नामका निषध पर पर्वत पाँच पुत्र पुराण पूर्व पृथिवी प्राप्त भगवान् भरत भागों में भी म० में यह ये योजन रहा रहे राजा लाख वर्णन वसुदेव वह वहाँ विदेह विस्तार वे सब समस्त सहित सागर सात सुशोभित सूर्य से से युक्त सौ स्थिति स्वर्ग हजार ही हुआ हुई हुए हे है और है तथा हैं हो होता है होती होते

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