I hamāra gīta

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Jānakī Prakāśana, 1985 - 68 pages

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अपनी अपने अर्थशास्त्र इ हमार गीत इन इस एक और कइसे कर करे कवन कवनो कवि कवि की कविता कविताओं कहीं का काव्य काहे के चुनरी किसान की कुछ के चुनरी रंगवलु के तान रे के साथ केकर केहु को खातीर गजल गोरिया चमकल छपरा जब जय किसान जय जवान जा जानकी जानकी प्रकाशन जाय जाला जिनगी जी जीवन जे डॉ० तथा तू तो तोहर दिन नइया ले प्राव ना ने पटना पर पिया मोर धीरे पीड़ा पुस्तक पोखरा प्यार के प्रकार प्रभुनाथ सिंह प्रा प्राइल प्राग प्राज बन बा बात बिहान बिहार बेअरिया भइल भइले भाषा भिखइन भी भीख भोजपुरी भोजपुरी के भोर माई मिलल में मोर मोर धीरे बोल मोरा यह रहल रही रहे राँची राजनीति राम रूप में लहर-लहर पुरवइया लागे लोग वह विश्वविद्यालय शीर्षक संगीत सब समाजवाद साहित्य सीता से स्थान हम हर हाथ हिन्दू ही हे है कि हैं होता है

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