Jaina siddhānta

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Bhāratīya Jānapīṭha, 2001 - Jaina philosophy - 231 pages
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On the fundamentals of Jaina philosophy.

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अत अपने अर्थ आगम आचार्य आत्मा आत्मा का आदि इस प्रकार इसी उनके उस उसका उसके उसी ऐसा कथन करके करता है करना करने कर्ण कर्म कहते हैं कहा है का अभाव का कारण कार्य काल किया है की की अपेक्षा के उदय से के द्वारा के लिए के साथ को कोई गया है चार चारित्र चाहिए जा जाता है जाते जिस जीव के जैसे जो तक तथा तरह तीन द्रव्य दो दोनों नय नहीं है नहीं होता निमित्त निश्चय ने परिणाम भाव भी माय मेद में कहा में भी में से मोक्ष यदि यह या ये रा रूप से वस्तु व्यवहार वे शरीर शुद्ध शेष सध्यादर्शन सध्यादृष्टि सब समय स्थिति स्वभाव स्वरूप सान ही ही है हुआ है अत है उसे है और है क्योंकि है कि है किन्तु है तो है वह है है हो जाता है होता है होती होते हैं होना होने पर होने से

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