Jainadarśana meṃ niścaya aura vyavahāra naya, eka anuśīlana

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Pārśvanātha Vidyāpīṭha, 1997 - Religion - 284 pages
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On Jaina logic and philosophy.

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अत अन्य अपने अभाव अमृत अर्थात् आगम आचार्य आत्मा आत्मा के आदि इन इस प्रकार इसलिए इसी उत्पन्न उदय उपचार से उपदेश उस उसका उसके उसे एक एवं ऐसा कथन कर करता है करते हुए करना करने कहते है कहा गया है कहा है का कार्य किन्तु किया गया किया है किसी की अपेक्षा के कारण के द्वारा के लिए के साथ केवल को क्योंकि गोक्षमार्ग जब जयपुर जा जाता है जाय जी जीव के जैसे जो तथ तो दिया दोनों द्रव्य धर्म नय नहीं है नहीं होता नाम निक्षयनय ने पर प्राप्त बतलाया भाव भिन्न भी भेद में मोक्ष यर यह या ये वने वह विषय वे शब्द शरीर संज्ञा सकता सत्य समय साधक सिद्ध स्पष्ट स्वभाव स्वयं ही हेतु है और है कि है तो हैं हो जाता है होकर होता है होती होते होना होने पर होने से

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