Jainaparamparā aura Yāpanīyasaṅgha: Bhagavatī-ārādhanā ādi solaha granthoṃ kī kartr̥paramparā

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सर्वोदय जैन विद्यापीठ, 2009 - Jaina literature
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Exhaustive work on Jaina traditions, sects, literature and doctrines.

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अत अथवा अध्याय अपने अपराजितसूरि अपितु अर्थ अर्थात् आचार्य आदि इन इस प्रकार इसलिए इससे उक्त उनके उन्हें उन्होंने उपर्युक्त उसके उसे एक एवं ऐसा कथन कर करता है करते हैं करना करने कहा गया का का उल्लेख कारण किन्तु किया गया है किया है किये किसी की कुछ कुन्दकुन्द के लिए के साथ केवल को कोई क्योंकि गई गये गाथा ग्रन्थ ग्रन्थों ग्रहण जब जा जाता है जाने जी जी ने जैसे जो टीका तक तत्वार्थसूत्र तथा तो था थे दिगम्बर दिया दो दोनों द्वारा नहीं है नाम निषेध ने पं० पर परिग्रह प्रमाण प्रयोग प्राप्त बतलाया बात भगवती-आराधना भाष्य में भाष्यकार माना मुनि मूलाचार में भी मोक्ष यदि यह यहाँ या यापनीय ये वर्णन वह वे शताब्दी शब्द श्वेताम्बर समय सर्वार्थसिद्धि सिद्ध सिद्ध है कि सिद्धसेन सूत्र से स्पष्ट ही हुआ हेतु है और हैं हो होता है कि होती होते हैं होना होने होने का

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