Kāvyaprakāśaḥ: samīkṣātmaka bhūmikā-bhāṣānuvāda-vyākhyā-vivecanātmakaṭippaṇīsahitaḥ

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Sāhitya Bhaṇḍāra, 1967 - Literary Criticism - 683 pages
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अतएव अथवा अन्य अब अभिनवगुप्त अर्थ की अर्थात् आदि आदि के इति इत्यादि इन इस प्रकार इसी उस एक ओज कर करता करते करने कहा का का उदाहरण काव्य किन्तु किया गया है किया है किसी की प्रतीति कुछ के अनुसार के कारण के द्वारा के लिये कैम को कोई क्योंकि गई गुण जा जाम जैसे जो तथ तु तो था दो दोनों दोष ध्वनि नहीं नहीं है नामक ने पद प्रकट प्रयोग प्रयोजन बम भाव भिन्न भेद मत में भी यदि यह यह है कि यहाँ पर या ये रस रहा राम रूप रूप में रूप से लक्षणा वस्तु वह वाक्य वाले विवेचन विशेष विषय वे शब्द का शिव श्लेष सकता सम्बन्ध से स्वरूप ही ही है हुआ हुए हेतु है और है कि है तथा है है हैं हो जाता है होता है होती होते होने

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