Kavi Aur Kavita

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Lokbharti Prakashan, Jan 1, 2008 - Hindi poetry - 219 pages
कवि और कविता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के छब्बीस विचारोत्तेजक निबन्/ाों का पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय संकलन है । इस संग्रह मेंमैथिल कोकिल विद्यापति, विद्यापति और ब्रजबुलि, कबीर साहब से भेंट, गुप्तजी % कवि के रूप में, महादेवीजी की वेदना, कविवर मधुर, रवीन्द्र–जयन्ती के दिन, कला के अर्धनारीश्वर, महर्षि अरविन्द की साहित्य–साधना, रजत और आलोक की कविता, मराठी के कवि केशवसुत और समकालीन हिन्दी कविता, शेक्सपियर, इलियट का हिन्दी अनुवादजैसे शाश्वत विषयों के अतिरिक्तकविता में परिवेश और मूल्य, कविता, राजनीति और विज्ञान, युद्ध और कविता, कविता का भविष्य, महाकाव्य की वेला, हिन्दी–साहित्य में निगम–धारा, निर्गुण पन्थ की सामाजिक पृष्ठभूमि, सगुणोपासना, हिन्दी कविता में एकता का प्रवाह, सर्वभाषा कवि–सम्मेलन, नई कविता के उत्थान की रेखाएँ, चार काव्य–संग्रह, डोगरी की कविताएँजैसे ज्वलंत प्रश्नों पर राष्ट्रकवि दिनकर का मौलिक चिन्तन आज भी उतना ही सार्थक और उपादेय है । सरल–सुबोध भाषा–शैली तथा नए कलेवर में सजाई सँवारी गई कविवर–विचारक दिनकर की यह एक अनुपम कृति है ।
 

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Contents

मैथिल कोकिल विद्यापति
11
महादेवीजी की वेदना
31
रवीन्द्रजयन्ती के दिन
49
महर्षि अरविन्द की साहित्यसाधना
79
रजत और आलोक की कविता
114
मराठी के कवि केशवसुत और समकालीन हिन्दी कविता
123
शेक्सपियर
130
कविता राजनीति और विज्ञान
145
हिन्दी कविता में एकता का प्रवाह
193
सर्वभाषा कविसम्मेलन
199
डोगरी की कविताएँ
216

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Common terms and phrases

अथवा अधिक अपनी अपने आज इन इस इसी उन उनका उनकी उनके उन्हें उन्होंने उस उसका उसकी उसके उसी उसे एक ऐसा ऐसे कर करता है करते हैं करने कला कल्पना कवि कविता कविता की कविताओं कवियों कहा का काम काव्य किन्तु किया किसी की की ओर कुछ के भीतर के लिए के साथ केवल को कोई क्या क्योंकि गई गए गया चाहिए जन्म जब जहाँ जा जाता है जाती जिस जीवन जो तक तथा तब तो था थी थे दिया देश दो दोनों धर्म नहीं है नाम ने पर पहले प्रकार फिर बहुत बात बाद भारत भाषा मगर मनुष्य में भी मैं यह यही या युग युद्ध ये रहा है रही रहे हैं रूप लोग वह वे श्री अरविन्द संसार सकता है सकती सकते सत्य सबसे सभी समय समाज साहित्य से हम हिन्दी ही हुआ हुई हुए हृदय है और है कि हैं हो होता है होती होते होने

About the author (2008)

जन्म: 23 सितम्बर, 1908, एक निम्न-मध्यवर्गीय कृषक-परिवार में (सिमरिया, तत्कालीन मुंगेर जिला, बिहार)। शिक्षा: 1923 में मिडिल की परीक्षा पास की और 1928 में मोकामा घाट के रेलवे हाई स्कूल से मैट्रिकुलेशन। 1932 में पटना कॉलेज से ग्रेजुएशन, इतिहास में ऑनर्स के साथ। आजीविका: 1933 में बरबीघा (मुंगेर) में नवस्थापित हाई स्कूल में प्रधानाध्यापक। 1934 से 1942 तक बिहार सरकार के अधीन सब-रजिस्ट्रार। 1943 से 1947 तक प्रान्तीय सरकार के युद्ध-प्रचार-विभाग में। 1947 में बिहार सरकार के जन-सम्पर्क विभाग में उपनिदेशक। 1950 से 1952 (मार्च) तक लंगट सिंह कॉलेज, मुजफ्फरपुर (बिहार) में हिन्दी विभागाध्यक्ष और प्रोफेसर। 1952 से 1964 तक सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर राज्यसभा के कांग्रेस द्वारा निर्वाचित सदस्य। 1964 में राज्यसभा की सदस्यता छोड़कर भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति। मई, 1965 से 1971 तक भारत सरकार के गृह-मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार। साहित्यिक जीवन का आरम्भ: 1924 में पाक्षिक ‘छात्र सहोदर’ (जबलपुर) में प्रकाशित पहली कविता से। प्रमुख कृतियाँ: कविता: रेणुका, हुंकार, रसवन्ती, कुरुक्षेत्र, सामधेनी, बापू, धूप और धुआँ, रश्मिरथी, नील कुसुम, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, कोयला और कवित्व तथा हारे को हरिनाम। गद्य: मिट्टी की ओर, अर्धनारीश्वर, संस्कृति के चार अध्याय, काव्य की भूमिका, पन्त, प्रसाद और मैथिलीशरण, शुद्ध कविता की खोज तथा संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ। सम्मान: 1959 में ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार और पद्मभूषण की उपाधि। 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय की तरफ से ‘डॉक्टर ऑफ लिटरेचर’ की मानद उपाधि। 1973 में ‘उर्वशी’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार। अनेक बार भारतीय और विदेशी सरकारों के निमन्त्रण पर विदेश-यात्रा। निधन: 24 अप्रैल, 1974।

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