Macherā

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Janabhāratī, 1995 - 80 pages
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अन्दर अपना अपनी अपने अब आँखों आज आया इस उठा उठी उठे उनके उस उसका उसकी उसके उसने उसी उसे एक और कंचन कभी कमरे कर दिया करने कहा कहाँ का कि किया किसी की की ओर की तरह कुछ के लिए के साथ को कोई क्या गई गए घर चला जब जा जाता जी जीवन जैसे जो तक तब तुम तो थी थीं दिन दिया था दी दूसरे दे देखा देर दो दोनों न जाने नरेन्द्र नहीं नाम नीचे ने पड़ पर परन्तु पहले पास फिर बम्बई बहुत बात बाद बाबा बार बाहर बीच भर भी मदारी मुगल मुझे में मेरे मैं मैंने यह रह रहा था रही रहीं थी रहे थे राणा रात लगा लगी लगे लिया ले लेकिन वह वहीं विलास वे शक्ति सब समय सामने साल सिर सूअर से सेठ हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है हैं हो गई हो गया होकर होने

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