Mahādevī Varmā aura unakī Dīpaśikhā

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Aśoka Prakāśana, 1964 - Poetry - 223 pages
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अत अधिक अनुभूति अपनी अपने अब अलंकार आत्मा आदि इन इस इसी उन उनका उनकी उनके उन्हें उस उसका उसकी उसके उसमें उसी प्रकार उसे एक ओर कता कर करता है करती करते करने करुणा कवयित्री कहती का काव्य किया है किसी की कुछ के कारण के लिए केवल को कोई क्योंकि गया है गीत गीतों चित्र जब जाता है जाती जिस प्रकार जीवन जैसे जो तक तथा तरल तरह तो दीपक दीपशिखा दृष्टि देता है देती दोनों नहीं नहीं है ने पथ पर पीडा पृथ्वी प्रकृति प्रिय प्रेम बन बना भर भाव भी मधुर महादेवी मुझे में में भी मेरे मैं यदि यह या रहता है रहा रूप में रूपक लगता है वह विरह वे वेदना समय साथ साधक साधना सुख से स्थिति स्वयं हिमालय ही हुई हुए हृदय है और है कि है जो है पर है है हैं हो जाता होता है होती होते होने ह्रदय

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