Maraṇa-jvāra

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Hindī Pracāraka Pustakālaya, 1963 - Poetry - 80 pages
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अपना अपनी अपने अमर आई आज आजादी आया आये इस उठ उठा उठी उठे उनकी उनके उन्होंने उस एक एशिया और कर करती कविता कहीं क्या का कावेरी कि किया किस की कुछ के को कोटि गगन गंगा घर चढ़ चरण चल चले चीन जग जब जय जवानी जिस जी जीवन जो न हो तक तरुणाई तुम तू तेरा तेरी तेरे तो था थे दिन दे देख देश दें दो धरा नर्मदा नहीं नागपुर ने नेपाल पर प्यारे प्राण पानी फिर बन बना बने बल बलि बलिदान बोल बोले भारत भारतवर्ष भी भुजा भेरी मत मुक्त मेरी में मैं यमुना यह यहीं युग ये रहा रही रहीं है रहे रहे हैं रूप लिए ले लेकर वह विश्व वे शिर शीश सपने सब समय स्वर सिर सी सीमा से हम हमारे हिमालय ही हुआ हुई हुए हूँ है है कि हैं होगा होता

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