Nagāṛe kī taraha bajate śabda

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Bhāratīya Jānapīṭha, 2005 - 95 pages
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अपना अपनी अपने अब अभी अरी असम आदमी आदिवासी इस उगे उन उनकी उन्हें उस उसकी उसके उसी उसे एक दिन और कई-म कभी कर करते कहाँ का किस किसी की तरह कुछ के लिए को कोई गया गयी गये गोबर घर चाहती चुप छोड़ जब जमीन जंगल जा जाएगा जाती है जाते जैसे जो तक तब तमाशा तुम तुमने तो था थी थे दिया दिल्ली दुनिया दुलारी देखा दो धर धरती नहीं नहीं है नाम ने पकी पद पर परगना पहाड़ पा पानी बरि बार भर भाया भी भी नहीं भीतर भेरी मत मुझे मेरा मेरी मेरे में मैं यती यम यया यर यल यह या ये रख रबी रह रहते रहा रही है रहे हैं रोज लिब ले लेकर वया वह वहीं वे शब्दों साथ से हम हमारी हाथ हाथों ही हुए हुम हूँ है कि है तुमने हैं हो होगा होता है होती होने

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