Padmāvata kā kāvyavaibhava

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Maikamilana Kampanī āpha Iṇḍiyā, 1974 - 151 pages

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अंत अत अधिक अनेक अपनी अपने अर्थ अलंकार अलाउद्दीन अवधी अस आदि आध्यात्मिक इस प्रकार इसमें इसी इसीलिए उन्होंने उसका उसकी उसके उसमें उसे एक कथा कबीर कर करता है करती करते करने कवि कवि ने कह कहा का कारण काव्य किया है की कुछ के लिए के साथ को कोई खंड गया है ग्रंथ जब जस जाता है जाती जायसी ने जैसे जो तक तथा तात्पर्य तेहि तो था थी थे दिया दृष्टि दोनों नख-शिख नहीं है नागमती पद पद्मावत की पद्मावत में पर परमेश्वर प्रस्तुत प्राप्त प्रेम प्रेम की फारसी फिर भी भारतीय भाषा भी मन मलिक मुहम्मद जायसी मिलता है मिलती में भी यह या रत्नसेन रस रहा राजा रूप रूप में लौकिक वह वही विरह वे शैली श्लेष संकेत सती सब साधना सिंहल सूफी से सो ही हुआ हुए है और है कि है है हैं हो जाता है होइ होता है होती होने

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