Prabhavati

Front Cover
Rajkamal Prakashan, Jan 1, 2007 - 191 pages
महाकवि निराला के उपन्यास-साहित्य में प्रभावती एक ऐतिहासिक उपन्यासकृति के रूप में चर्चित है। इसका कथा-फलक पृथ्वीराज-जयचन्दकालीन राजाओं और सामन्तों के पारस्परिक संघर्ष पर आधारित है। इस संघर्ष का कारण प्रायः विवाह और कन्यादान हुआ करता था। प्रभावती भी, जो एक किलेदार की कुमारी है, एक ऐसे ही संघर्ष का केन्द्र है। लेकिन इस स्वाभिमानी नारी-चरित्र के पीछे निराला का उद्देश्य आधुनिक भारतीय नारियों में संघर्ष-चेतना का विकास करना भी रहा है। यही कारण है कि प्रभावती और यमुना-जैसे नारी-पात्र स्वयं खड्गहस्थ हैं और नैतिकता के लिए कोई भी बलिदान करने को सन्नद्ध हैं। वस्तुतः निराला के गहरे ऐतिहासिक बोध और कवि- कल्पना का इस उपन्यास में अद्भुत सम्मिश्रण हुआ है - ओज और माधुर्य का अपूर्व निर्वाह।
 

What people are saying - Write a review

We haven't found any reviews in the usual places.

Contents

Section 1
7
Section 2
9
Section 3
13
Section 4
22
Section 5
26
Section 6
55
Section 7
60
Section 8
77
Section 10
94
Section 11
115
Section 12
119
Section 13
126
Section 14
149
Section 15
157
Section 16
170
Section 17
178

Section 9
81

Common terms and phrases

अच्छा अपनी अपने अब आज आप इस उन्हें उस उसके उसने उसी उसे एक और कर करती करते करने कहकर कहा का कान्यकुब्ज कारण कि किया किसी की की ओर कुछ कुमार के पास के लिए के साथ को कोई क्या गई चुकी जा जैसे जो तक तरह तुम तुम्हारी तो था थी थीं थे दिया दी दूर दूसरे दृष्टि से देख देखकर देखा देर देवी दो दोनों नहीं नाम नाव ने कहा पत्र पर पहले पूछा प्रभा प्रभावती फिर बलवन्त बहुत बात बाद बोली भाव भी महाराज महाराजाधिराज महेश्वरसिंह मालूम मुझे में मैं यमुना को यमुना ने यह यहाँ रह रहा रही थी रही है रहे थे राजकुमार राजा महेन्द्रपाल रामसिंह रूप लगा लगी लगे लिया ले लेकर वह वहाँ विचार विद्या वीरसिंह वे सब समय सामने सिपाही से हाँ हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है हैं हो हो गई हो गए हो गया होकर होगा होने

About the author (2007)

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' नराला का जन्म वसन्त पंचमी, 1896 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल नामक देशी राज्य में हुआ। निवास उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़ा कोला गाँव में। शिक्षा हाईस्कूल तक ही हो पाई। हिन्दी, बांग्ला, अंग्रेजी और संस्कृत का ज्ञान आपने अपने अध्यवसाय से स्वतन्त्र रूप में अर्जित किया। प्राय: 1918 से 1922 ई. तक निराला महिषादल राज्य की सेवा में रहे, उसके बाद से सम्पादन, स्वतन्त्र लेखन और अनुवाद-कार्य। 1922-23 ई. में 'समन्वय (कलकत्ता) का सम्पादन। 1923 ई. के अगस्त से 'मतवाला'—मंडल में। कलकत्ता छोड़ा तो लखनऊ आए, जहाँ गंगा पुस्तकमाला कार्यालय और वहाँ से निकलनेवाली मासिक पत्रिका 'सुधा' से 1935 ई. के मध्य तक सम्बद्ध रहे। प्राय: 1940 ई. तक लखनऊ में। 1942-43 ई. से स्थायी रूप से इलाहाबाद में रहकर मृत्यु-पर्यन्त स्वतन्त्र लेखन और अनुवाद कार्य। पहली प्रकाशित कविता : 'जन्मभूमि' ('प्रभा', मासिक, कानपुर, जून, 1920)। पहली प्रकाशित पुस्तक : 'अनामिका' (1923 ई.)। प्रमुख कृतियाँ : कविता-संग्रह : अनामिका, आराधना, गीतिका, अपरा, परिमल, गीतगुंज, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, बेला, अर्चना, नए पत्ते, अणिमा, रागविराग, सांध्य काकली, असंकलित रचनाएँ। उपन्यास : बिल्लेसुर बकरिहा, अप्सरा, अलका, कुल्लीभाट, प्रभावती, निरुपमा, चोटी की पकड़, भक्त ध्रुव, भक्त प्रहलाद, महाराणा प्रताप, भीष्म पितामह, चमेली, काले कारनामे, इन्दुलेखा (अपूर्ण)। कहानी-संग्रह : सुकुल की बीवी, लिली, चतुरी चमार, महाभारत, सम्पूर्ण कहानियाँ। निबन्ध-संग्रह : प्रबन्ध प्रतिमा, प्रबन्ध पद्म, चयन, चाबुक, संग्रह। संचयन : दो शरण, निराला संचयन (सं. दूधनाथ सिंह), निराला रचनावली। निधन : 15 अक्टूबर, 1961

Bibliographic information