Pragītakāra Baccana aura Āńcala

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Racanā Prakāśana, 1979 - Hindi poetry - 90 pages
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अंचल अधिक अनुभूति अनुभूतियों अपनी अपने अब अभिव्यक्ति आधुनिक इसके इसी उनका उनकी उसका उसकी उसके उसे कर करता है है करती करते करते हुए करना करने के कवि की कविताएँ कविताओं में कवियों कवियों के कहा का का प्रयास कारण काव्य में किया है कुछ के प्रति के रूप में के लिये के समान को गई गया है चेतना जब जाता है जाती जीवन तक तथा तो था है थी थे है दिया दृष्टि से देता है नयी नही निर्माण ने पुना प्रकार प्रतीक प्रत्युत प्रेयसी भावना भावनाओं भी मधुशाला मन मुक्त में कवि मैं यही यहीं या युग रहा रा रूप से विकास संसार समय साहित्य हम हिन्दी ही हुआ है हुई हुए है इन है और है कि है किन्तु है जो है पर है ये है वह है वे है है इस है है कवि है है यह हैं हो होता है है होती होते

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