'Prasāda' aura unakā 'Ām̐sū': ālocanātmaka vyākhyā tathā vivecana

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Rīgala Buka Ḍipo, 1968 - Poetry - 208 pages
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अत्यन्त अनुप्रास अनेक अपनी अपने अपने प्रियतम अब अलंकार अहि आदि आँसू इन इस इस प्रकार इसी उपमा उस उसका उसकी उसके उसमें उसी उसे एक एवं ओर कर करता करती करते हुए करना करने कहता है का काव्य किन्तु किया है किसी की कुछ के कारण के लिए को कोई गई चित्रण जब जाती जी जीवन की जो तक तथा तुम तुम्हारे तो था थी थे द्वारा दिया दृष्टि दोनों नहीं पद में कवि पर प्रकार प्रकृति प्रतीक प्रसाद प्रियतम के प्रेम फिर भर भी मधुर मन मानवीकरण मुझे मेरा मेरी मेरे में कवि ने में ही मैं यह यहाँ रस रहा रहे रूप में रूपक रूपी वह व्यक्त विशेष वे वेदना शब्द श्लेष समस्त संसार स्पष्ट साथ सुख सुन्दर से सौन्दर्य ह्रदय ही हुआ है हुई हृदय है और है कि है है हैं हो गया होकर होगा होता है होती होते होने

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