Samarāiccakahā, Volume 1

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Śrī A. Bhā. Sādhumārgī Jaina Saṅgha, 1976 - Jaina ethics

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अत्यन्त अनेक अपने आचार्य आदि आया इति इव इस इसलिए उत्पन्न उनके उन्हें उन्होंने उस उसका उसके उसने उसे एक एव एवं ऐसा और कर करता करते करना करने कहा का कि किया किया है किये किसी की की तरह कुछ कुलपति कुसुमावली के कारण के लिए के साथ को क्या गई गया गये चा जा जैन जो तं तओ तत ततो तथा तब तस्य ता ति ति है ते तेन तो था थी थे दिया देव द्वारा धर्म नगर नहीं नाम नामक ने पर प्रति प्राकृत प्राप्त बरगद बहुत बीच भणियं भी मए मन मम मया मुझे मेरा मेरे मैं मैंने यह या यों रहा राजा ने राज्ञा रूपी लगा लि वह वहां वा वाले वि वे वेव शरीर संसार सब समय सुन्दर से सो सोमदेव स्थित हरिभद्र ही हुआ हुई हुए है कि है है हैं हो होता होते होने

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