Samasya natakakara Lakshminarayana Misra

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Pakshasala Prakasan, 1976

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अंक अपनी अपने इन इस इसके इसी उनके उपरान्त उमाशंकर उस उसका उसकी उसके उसे एक एवं ओर कथानक कर करता है करती करना करने का किया गया है किया है किसी की कुछ के नाटकों के माध्यम से के लिए के साथ केवल को कोई क्योंकि गई चम्पा चरित्र जब जा जाता है जीवन तक तथा तो था दिया दृष्टि दृष्टिकोण देता है नरेन्द्र नहीं है नाटक के नाटक में नाटकों के नाटकों में नाट्य नारी ने पर पात्र पाश्चात्य पुरुष पृ० प्रस्तुत प्रादि प्राधार प्राशा प्रेम भारत भारतीय भारतीय संस्कृति भाषा भी मनोरमा मायावती मालती मिश्र मिश्रजी के मुनीश्वर में भी यथार्थवादी यह रजनीकांत रूप से वह विवाह विश्वकांत व्यक्त शत्रुसूदन संघर्ष संस्कृति सभी समय समस्या नाटकों समस्याओं समाज सम्बन्ध सामाजिक से स्पष्ट हिन्दी ही हुआ है हुई हुए हृदय है और है कि है किन्तु है जो हैं हो होता है होती होते होली

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