Sataraṅginī

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Rajpal & Sons, 2009 - Hindi poetry - 144 pages
 

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Contents

Section 1
5
Section 2
33
Section 3
37
Section 4
43
Section 5
71
Section 6
111
Section 7
125
Section 8
131
Section 9
138
Section 10
141
Section 11
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Common terms and phrases

अथवा अन्तर अपना अपनी अपने अब आज आती आप आशा इस इसे उस उसका उसकी उसके उसे ऊपर एक और कब कभी करता करती करने कवि कविता कहता कहाँ का किया किसी कुछ के आँगन में के लिए केवल को कोई कौन क्या गई गया है गीत चुका जब जा जाता है जाती जिसे जीवन की जो तक तरह तुझे तुम तुम हो तुमने तू तूने तेरी तेरे तो था थी दिन दिया दी दुनिया दे दो दोनों नयन नर्तन कर नव नवल नहीं नागिन नाच नारी निर्माण ने पर पहले पाठकों पुरुष प्रति प्रतीक फिर बच्चन बहुत बात बाद बैठा भी मन में मयूरी मुझे मेरा मेरी मेरे जीवन के मैं मैंने यदि यह या रंग रहा रही है रात रूप लिखा ले लो वह वे सतरंगिनी सब समय साथ से स्वर हवा ही हुआ हुई हुए हूँ हृदय है कि हैं हो होगा होगी होता है होती

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