Śaunakīyā Atharvaveda saṃhitā: ...

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Mādhavapustakālayah,̣, 1974

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१० ११ १२ १६ अग्नि अथवा अपनी अपने अर्थात् इति इन इन्द्र इस उत्पन्न उस उसका उसके उसे एक ओर और कर करके करता है करती करते हैं करने वाले करे का काण्ड किया की के लिये के साथ को को प्राप्त गया है जल जाता है जिस जो तं तथा तुम तू ते तेरे तो त्वा दूर दे देव देवता देवा देवाः दोनों द्वारा धारण नः नहीं ने पर पुरुष पृथ्वी प्र प्रकार प्रदान प्राण प्रादि बृहस्पति ब्रह्म ब्रह्मचारी ब्राह्मण भवति भी भूमि मन्त्र मा में मैं य एवं यः यज्ञ यत् यथा यद् यह यहां या ये यो लोक वरुण वशा वह वा वाला वाली वि वे वेद वै व्रात्य शरीर सं सब सम्पूर्ण सा सूक्त सूर्य से सोम हम हमारे हमें ही हुई हुए हुश्रा हूँ हे है कि हो होकर होता है होने

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