Tantra siddhānta aura sādhanā

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Smr̥ti Prakāśana, 1976 - Tantrism - 292 pages

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अग्नि अथर्ववेद अथवा अनेक अपने अर्थ आदि इन इस इस प्रकार इसका इसके इसी उत्पन्न उस उसी उसे एक कर करता है करती करते हैं करने से करे कहा जाता का किन्तु किया किया जाता है किसी की की साधना कुछ के लिए के लिये को कोई गया है चक्र चाहिये जब जल जाए जाती जाते हैं जिस जो ज्ञान तंत्र तक तत्व तत्व का तथा तीन दिन दुर्गा दूर देवता दो दोनों द्वारा धारण ध्यान नम नहीं नाम ने पर पृथिवी प्रकार प्रकार के प्रयोग प्राप्त बार बीज ब्रह्म भी मंत्र मन मन्त्र महाकाली महाशक्ति मूल में यंत्र यदि यह या ये योग रहता है रहती रूप में वह विद्या वेद शक्ति शब्द शरीर शिव सभी समय साधक साधना सिद्धि सूर्य सृष्टि स्वरूप हवन ही हुआ हुए है और है कि हैं हो जाता है होकर होता है होती होते हैं ह्रीं

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