Tarapath

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Lokbharti Prakashan, Jan 1, 2009 - 192 pages
तारापथ का यह परिवर्धित संस्करण पंतजी के समग्र काव्य साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है । वीणा से लेकर अधुनातन कृति संक्रांति तक के काव्य संग्रहों से उनकी रचनाओं का सुरुचिपूर्ण चयन इसमें प्रस्तुत किया गया है । इस संकलन की विशेषता यह है कि इसमें पंतजी की नवीनतम कृतियों का प्रतिनिधित्व पाठकों को मिलेगा । पन्तजी ने इस युग को एक 'महासंक्रान्ति युग' कहा है । इस महासंक्रान्ति काल की कविता में आस्था और लोकमंगल को प्रतिष्ठित करना किसी भी साधारण प्रतिभा और जीवन-दृष्टि के कवि के बूते के बाहर की बात है । जबकि विघटन, विश्रृंखलता, नैतिक मूल्यों का हास चारों ओर दिखाई पड़ रहा है, उसमें महाकवि पन्त का यह स्वप्न ('मुझे स्वप्न दो, मुझे स्वप्न दो') एक महान जीवन और विराट आस्था की परिकल्पना करता है । यही वह संदेश है, जो समस्त पन्त-काव्य के अन्दर-ही-अन्दर प्रवाहित होता हुआ हमें मिलता है । उनका समस्त काव्य अन्तर्मुखता का काव्य न होकर आत्मोत्कर्ष का काव्य है । यह आत्मोत्कर्ष अपनी समग्र संरचना में एक सार्वभौमिक शुभेच्छा तक ले जाता है । इसीलिए उनका काव्य अतीतोम्मुख न होकर वर्तमान के फलक पर भविष्योन्मुखी काव्य है । यह सार्वभौमिक शुभेच्छा ही वह तत्व है, जिसके भीतर से कवि पन्त ने विश्व-मानव और नव-मानव की परिकल्पना को अपनी कविता में सार्थक किया है । अपनी सम्पूर्ण काव्य-सम्पदा के भीतर से उन्होंने एक नये और निजी अध्यात्म की रचना की है । यह अध्यात्म अपनी मंगलकामना में निजी होते हुए भी 'स्व' की भावना से पूर्णतया मुक्त है ।
 

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Contents

Section 1
33
Section 2
35
Section 3
41
Section 4
42
Section 5
44
Section 6
52
Section 7
78
Section 8
81
Section 11
93
Section 12
95
Section 13
108
Section 14
128
Section 15
144
Section 16
164
Section 17
166
Section 18
182

Section 9
87
Section 10
91
Section 19
189
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Common terms and phrases

अधिक अन्तर अन्दर अपनी अपने अब आज इन इस इसी ई० उनकी उर में उस उसका उसकी उसके एक ओर कर करती करते करने कला कवि की कविता के कविताओं का कारण काव्य किया की कविता कुछ के प्रति के लिए को कोमल कौन क्या क्षण गया ग्राम्या चेतना छायावादी जग जन जब जल जा जाता जाने जीवन जीवन का जो तक तब तरह तारापथ तुम तुम्हारा तुम्हें तो था थी थे दृष्टि देता दो धरती नभ नव नहीं नहीं है निज ने पन्त पन्तजी पन्तजी ने पर पल्लव प्राण प्रिय फिर बन भर भाषा भी भीतर भू मन मानव मुख मुझे में में एक मेरी मेरे मैं मौन यह यहाँ या युग रहा रहे रूप ले वह वाणी वाली विश्व वे शब्द संसार सत्य सम्पूर्ण साथ सुख से स्वप्न स्वर हम ही हुआ हुई हुए हूँ हृदय हे है और है कि हैं हो होकर होगा होता होने

About the author (2009)

सुमित्रानंदन पंत जन्म: 20 मई, 1900 कौसानी (उत्तरांचल में) । शिक्षा: प्रारम्भिक शिक्षा कौसानी के वर्नाक्यूलर स्कूल में। 1918 में कौसानी से काशी चले गए, वहीं से प्रवेशिका परीक्षा पास की। प्रकाशित पुस्तके : कविताा-संग्रह: वीणा, ग्रन्थि, पल्लव, गुंजन, ज्योत्स्ना, युगपथ, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूली, मधुज्वाल, उत्तरा, रजत-शिखर, शिल्पी, सौवर्ण, युगपुरुष, छाया, अतिमा, किरण-वीणा, वाणी, कला और बूढ़ा चाँद, पौ फटने से पहले, चिदंबरा, पतझर (एक भाव क्रान्ति), गीतहंस, लोकायतन, शंखध्वनि,शशि की तरी, समाधिता, आस्था, सत्यकाम, गीत-अगीत,संक्रांति, स्वच्छंद ! कथा-साहित्य : हार, पांच कहानियां ! आलोचना एवं अन्य गद्य-साहित्य : छायावाद : पुनर्मूल्यांकन, शिल्प और दर्शन, कला और संस्कृति, साठ वर्ष : एक रेखांकन ! पुरस्कार : 1960 में कला और बूढा चाँद पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 1961 में पद्मभूषण की उपाधि, 1965 में लोकायतन पर सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार, 1969 में चिदंबरा पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार ! 28 दिसम्बर 1977 को देहावसान !

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