Tattvārthasūtra

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Pārśvanātha Vidyāśrama Śodha Saṃsthāna, 1976 - Jaina philosophy - 441 pages

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अथवा अधिक अनेक अन्य अपने अर्थ अर्थात आत्मा आदि इन इस इस प्रकार इसलिए इसी उनके उस उसका उसके एक ऐसा कर करता करते करना करने कर्म कहा का किसी की की अपेक्षा कुछ के अनुसार के कारण के लिए के साथ केवल को कोई क्योंकि गया है चार जब जा जाता है जीव जैन जैसे जो ज्ञान तक तथा तब तरह तीन तो था दर्शन दिगम्बर दूसरे दो दोनों द्रव्य द्वारा ध्यान नहीं है नाम ने पर पर भी परम्परा परिणाम पहले पाँच प्रकार प्राप्त फिर बाद भाष्य भी भेद में भी मोक्ष यह यहाँ या ये रा० रूप में रूप से वर्णन वस्तु वह विचार विशेष वे शब्द शरीर सकता सब सभी समय सूत्र स्थान स्थिति स्वरूप ही हुए है और है कि है है हैं हो होता है होती होते हैं होने पर होने से

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