Tere digdigantara abhirāma

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Neśanala Pabliśiṅga Hāusa, 1985 - 71 pages

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अपनी अपने अब भी अभिराम आग आज आमरण इस उस उसे एक और कब कभी कमल कर करता कवि कहीं का काव्य कितना कितने किसी की की रात कृष्ण के लिए केवल कैसे को को स्मरण दिलाते कोई कौन क्या खेल गंगा गंगे गा गान गीत गोबर घडी घर चल चाहता जब जब तक जल जहाँ जाती जाना जाने जीवन जैसे जो जो हम को तू तेरा तेरी तेरे तेरे बिन तो दिन दे दो टूक दोनों धरती धार धोती ध्वनि नक्षत्र नयी नहीं पर पुन पूरी पेड़ प्यारी प्रति प्राणों प्रेम फिर बना बराती बह बार बिटिया बीत बोल भाई भारत भी भू भूख मन मात्र मुझे में मेरा मेरी मेरे मैं मौन के यह रथ रमा रहता राम ले वह वहीं विरह वेदना सतत सत्य सदा साथ सारे सुख सृष्टि से सोने स्वयम् हरित हरे हाथ हिन्दी ही हुआ हुए हूँ है हो

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