Ustāda kī jagaha k̲h̲ālī hai: aprakāśita pratinidhi racanāoṃ kā saṅgraha

Front Cover
Nīlābha Prakāśana, 1985 - 148 pages

From inside the book

What people are saying - Write a review

We haven't found any reviews in the usual places.

Contents

Section 1
Section 2
Section 3

7 other sections not shown

Other editions - View all

Common terms and phrases

अथवा अपनी अपने आज आप आपके आया इलाहाबाद इस इसलिए उत्तर उन उनकी उनके उन्हें उन्होंने उपन्यास उस उसका उसकी उसके उसने उसे एक ऐसा ऐसी ऐसे ओम प्रकाश कभी कर करता करते करने कहा कहानी कहीं क्या का काम किया है किसी की कुछ के लिए को कोई गया गये घर छोड़ जब जा जाता जाने जिन्दगी जी जो तक तब तरह तुम तो था थी थीं थे दिन दिया दे दो दोनों नहीं ने पत्नी पर पहले पंजाबी पाठक पाठकों पिता फिर बहुत बात बातें बाद बार भी मन माँ मुझे मेरा मेरी मेरे में मैं मैंने यदि यह यहाँ या याद रचना रहा रहे रूप लगता लगा लिखने लिखा ले लेकिन लेखक वह वाले वे शायद सकता सब समय समाज साथ साहित्य से हम हिन्दी ही हुआ हुई हुए हूँ है और है कि है तो है है हैं हो गयी होता होती होने

Bibliographic information