Vāstusāraḥ

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Parikramā Prakāśana, 2006 - Architecture, Domestic - 469 pages
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Contents

प्रकरणम् श्लोका पृष्ठङ्क
वास्तुशास्त्रकथनारम्भः 9
1
9२२१२४ 21
2
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Common terms and phrases

१२ १६ २४ २६ ३२ अंगुल अथवा अधिक अर्थात् आदि इन इन्द्र इसी उत्तर उस उसी ऊँचाई एक एवं और कम कर करके करना करने का का भाग कार्य किया जाता है की की ओर के लिए को गया है गृह ग्राम घर में घरों चारों चाहिये जा जाती जिस जो तक तथा तीन तु दक्षिण दिति दिशा में दिशाओं देने देवता दोनों द्वार धन नक्षत्र नहीं नाम निर्माण निवास निवेश ने पद पदों में पर पश्चिम पूर्व ब्रह्मा ब्राह्मण भवन भी भूमि मान में यदि यह या ये रूप रेखा लम्बाई वर्ग वह वा वाली वाले वास्तु वास्तु के वास्तु पुरुष वास्तुशास्त्र विचार विन्यास विश्वकर्मा वृत्त वृद्धि वैश्य शास्त्र शुभ शूद्र शेष श्लोक संख्या सकता है समय सुग्रीव सूर्य से स्थान हाथ ही हुआ है कि हैं हो तो हों होगा होगी होता है होती होते हैं होने

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