Vaiśeṣikasūtropaskāraḥ : Vidūc cūdamaṇiśrīśaṅkaramiśraviraci taḥ ; 'Prakāśikā' Hindīvyākhyope taḥ ; vyākhyākāraḥ Ācārya Ḍhuṇḍirāja Śāstrī ; saṃpādakaḥ Śrī Nārāyaṇa Miśraḥ

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Caukhambā Saṃskr̥ta Sīrīja Āphīsa, 1969 - Philosophy - 582 pages
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अणु अत अथवा अनुमान अनेक अभाव अर्थ है अर्थात् आकाश आत्मा आदि आधार आश्रय इत्यादि इति इस प्रकार इसी उक्त उत्पति उत्पन्न उस उसमें एक एव एवं ऐसी और कयोंकि कर करते करने कर्म कहते हैं कहते हैं कि कहा क्रिया का का अर्थ कार्य काल किन्तु किया की के समान के संयोग को गुण गुणों जल ज्ञान जाति जिस जो तथा तो द्रव्य दूसरे दो दोनों दोष धर्म न होने से नहीं है नहीं हो सकता नहीं होता नाश नित्य ने पक्ष पद पदार्थ पर प्रत्यक्ष पृथिवी भिन्न भी भेद मत मन में भी में वर्तमान मैं यदि रहने रूप लक्षण वह वा वायु वाले विभाग विशेष विषय शब्द शरद शरीर शंका संयोग सिद्धि सिध्द सूत्र से उत्पन्न ही हुआ हुए हेतु है ऐसा है यह है है होगा होता है होती होते हैं होना होने के कारण होने पर होने से

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