Vaidika sāhitya meṃ nārī

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Vāsudeva Prakāśana, 1964 - Vedic literature - 172 pages
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अत अथर्व अथर्ववेद अथवा अधिक अधिकार अनेक अन्य अपनी अपने अर्थात् आदि आपस्तम्ब इन इस प्रकार इसी उत्पन्न उपनिषद उल्लेख उस उसका उसकी उसके उसी उसे ऋग्वेद एक एवं और कन्या को कर करके करता है करती करते करना करने का करने में करने वाली करे कहा कारण किन्तु किया गया है किया है किसी की के अनुसार के लिए के लिये के साथ को कोई गयी घर चाहिए जाती है जिस जीवन जो तक तथा तू तो था दोनों द्वारा धर्मसूत्र नहीं नारी ने पति पति के पत्नी पर पिता पुत्र पुरुष प्रकार के प्राप्त बौधायन भी मनु माता में में भी मैं यजुर्वेद यदि यह या रूप वधु वसिष्ठ वह वाले विचार विवाह वे वेद वैदिक वैदिक साहित्य व्यक्ति सन्तान समान सम्बन्ध साहित्य में से स्पष्ट ही हुआ हुए है कि है है हैं हो होता है होती होने

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