Yugavāṇī: gīta gadya

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Rājakamala Prakāśana, 1966 - 119 pages
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अखिल अब अमर आज आत्मा इस उर उसे एक एवं और कर करता करती करो का कि के प्रति के लिए केवल को कोमल गंगा गई गए गत गया चिर चेतना जग जग जीवन जगत जड़ जन जल जलद जहाँ जिस जीवन के जीवित जो ज्ञान तन तमस तुम तुम्हारे दर्शन दल दिशि देश दो द्वार नव नवीन नहीं नारी निखिल निज निर्माण निर्मित नूतन नृत्य ने पर पल पशु पावन पूर्ण प्रकाश प्रकृति प्राण प्रिय प्रेम फिर बन बने बहु भर भव भाव भी भू मधु मधुर मन मांस मानव मानव के मानवता मुक्त मुख मुझे में मैं यह युग की युग युग युगवाणी रंग रक्त रम्य रह रहा रहे राग रूप रोम वर्ग वह वाणी विकसित विकास विज्ञान विश्व वे शक्ति शत संस्कृति सके सत्य सब सुन्दर से सौन्दर्य स्वप्न स्वर स्वर्ग हरित ही हुई है हैं हो हों

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