Banaile phūla: Vratoṃ aura parvoṃ kī kathāem̐

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Neśanala Pabliśiṅga Hāusa, 1970 - Fasts and feasts - 212 pages
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Contents

लोकजीवन में वतकथाओं का महत्त्व
यमराज
१० नैया दूज

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अपनी अपने अब आई आज आदमी आप आया आये इस इसी उठा उनका उनके उन्होंने उस उसका उसकी उसके उसने उसी उसे ऐसा ओर और कभी कर करके करती करने कह कहानी कहीं का कार्तिक कि किया किसी की कुछ के के लिए कैसे को कोई कौन क्या खाना गंगा गये घर में चल जब जा जाता है जाती जाने जी जैसे जो तक तुम तुम्हारे तू तो था थी थे दिया दी दे देखा देवता दो दोनों नहीं नाम ने ने कहा पर पहले पानी पार्वती फिर बहुत बहू बात बोली भगवान भर भारत भी भैया मत मन माँ मुझे में में ही मेरे मैं यह रह रहा था रही रहीं थी रहे राजकुमार राजा रानी राम रूप रूपा लगा लगी लिया ले वह वे शिव सकता सब साथ सास सिर से सोना हमारे हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है हैं हो गई हो गया होता

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