रश्मिSāhitya Bhavana, 1962 - 104 pages |
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अपना अपनी अपने अब अलि अश्रु असीम आँसू आता इन इस उस उसका उसकी उसके उसमें उसे एक ओस कण कभी कर करता करुणा कारण काल कि किसी की कुछ के के लिए के समान को कौन क्या क्यों गया घन चिर छाया जग जब जल जाता है जाती जाते जिस प्रकार जिसमें जीवन का जो तब तम तारों तुम तो था थे दिन दीपक दुःख दुख दे देख देखें देता देती है नभ नव नहीं पथ पर परन्तु पल पलकों पीड़ा प्रभात प्राण प्राणों फिर बन बाँध भर भी मधु मधुर मन मनुष्य मनुष्य का महादेवी वर्मा मानस मुझे मूक मृदु में मेघों मेरा मेरे मैं मोती यह या रहता है रात रूपी लघु ले वह विश्व विस्मृति वीणा वे वेदना संगीत संसार सा सी सीमा सीमित सुकुमार सुख सृष्टि से स्मृति स्वप्न हिम ही हुआ हुई हुए हूँ हृदय में है और हैं हो जाता होता होने



