Ādhunikatā ke sandarbha meṃ hindī kahānī

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Jayasī prakāśana, 1982 - 144 pages
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१८ अनुभव अपनी अपने अभिव्यक्त आदमी आधुनिकता इन इस कहानी में इसे उनकी उनके उन्हें उस उसका उसकी उसके उसे एक कर करके करता है करने करने की कहानियों में कहानी के का किया गया है किया है किसी की कहानियों में की कहानी कुछ के प्रति के लिए के साथ को कोई क्या गयी चित्रण चेतना जा सकता है जाता है जाने जीवन जैसे जो ढंग तक तरह तो था थी थे दशक दिया दिल्ली दृष्टि दौर द्वारा धर्मवीर भारती नयी कहानी नहीं है ने पर पहचान प्रक्रिया प्रवृत्ति प्रेमचन्द बात ब्यौरों भी मानवीय मानसिक मानसिकता मैं यथार्थ यह यहां या ये रहा है रही रहे रामदरश मिश्र लगता है लेखक ने वह वाली वाले वे व्यक्ति व्यवस्था संबंधों संयोजन सकती सम्बन्धों सामने सामाजिक से स्थिति स्थिति का स्थितियों के हम ही हुआ है हुई हुए हूं है और है कि है जो हैं हो होता होते होने

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