SaptaparnaLokbharti Prakashan, Sep 1, 2008 - 212 pages |
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अतः अथर्ववेद अधिक अनेक अन्य अपनी अपने अब अश्वघोष आज आदि इस उनकी उनके उस उसका उसकी उसके उसी उसे ऋग्वेद एक ऐसी ओर कथा कभी कर करके करता है करती करने कवि का कालिदास काव्य किन्तु किया किसी की कुछ के कारण के प्रति के लिए के समान के साथ को कोई गया जब जयदेव जल जिस जिसके जीवन के जैसे जो ज्यों तक तथा तब तुम तो था थी थे दिया दे देख देता धरती धर्म नहीं नूतन ने पथ पर परन्तु पृथ्वी प्रकार प्रकृति प्रथम प्राप्त भवभूति भाषा भी मनुष्य महाभारत मानव मानो में में भी मेरे मैं यह या रचना रहा रही रहे राम रामायण रूप में वह वही वाले विविध विशेष वे वेद शकुन्तला शान्त संस्कृत सत्य सब समय सम्भव साहित्य सीता से सौन्दर्य स्थिति हम हमें हित ही हुआ हुई हुए हृदय है और है कि हैं हों होकर होता है होती होने


