Rādhā. [lekhaka] Jānakīvallabha Śāstrī, Volume 1

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अनुभूति अन्तर अपना अपनी अपने अब अर्थ आई आकाश आत्मा आया इस उयों उर उस उसे ऊपर एक ऐसे ओर और कब कर करता करती करों कहाँ कहीं का काव्य कि किन्तु किसी की कुछ के के लिए केवल कैसे को कोई क्या गई गए गति गया छन्द छाया जड़ जब जल जा जाए जाता है जाती जाने जीवन जैसे जो तक तन तब तम तुम तुम्हारा तो था थी थे दिन दृष्टि देखा देती धन नभ नहीं ने पथ पर पहले प्र प्रकाश प्रणय प्राण प्राणों फिर फूल बन भर भाव भी भेरी मत मन मन के मुझे में मेरा मेरी मेरे मैं यदि यमुना यह यहाँ या यों रस रह रहता रहा रही रहे राग राधा रूप लगता ले वन वह वाणी सकता सत्य सब सागर सिर सुर से स्वर ही हुआ हुई हुए हूँ है है हैं हो होगा होता है होती होने

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