"Anekānta-vāda as the basis of equanimity, tranquality [sic] and synthisis [sic] of opposite view points"

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Pārśva Iṇṭaraneśanala Śaikshaṇika aura Śodhanishṭha Pratishṭhāna, 1999 - Anekāntavāda - 105 pages
On Jaina theory of Knowledge and philosophy.

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अथवा अनन्त अनेक अनेकान्त अनेकान्तवाद अन्य अपनी अपने अपेक्षा अर्थ अहिंसा आत्मा आदि आधार इन इस इस प्रकार इसी उन उस उसका उसके उसे एक ही एवं ऐसा कथन कर करके करता है करते करना करने कर्म कहा का कारण किन्तु किया किया है किसी की कुछ के लिए को कोई क्षेत्र गया है चार्वाक जब जा सकता जाता है जाय जीव जैन दर्शन जो ज्ञान तथा तब तो था दर्शन दार्शनिक दिया दूसरे दृष्टि से दो दोनों द्रव्य धर्म नहीं है नित्य ने पदार्थ पर परस्पर पूर्ण प्रत्येक भगवान भाव भिन्न भी है महावीर में यदि यह यही या ये रूप रूप में रूप से लिये वस्तु के वह विचार विरोधी विश्व विषय वे शब्द सकता है सत्य सभी समन्वय समय साथ सिद्धान्त से ही स्पष्ट स्यादूवाद स्वरूप हम ही ही है हुआ हुए है और है कि हो होता है होती होते होने

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