NīrajāBhāratī Bhaṇḍāra, 1966 - 111 pages |
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अणु अपनी अपने में अब अलि आँसू आज आते इलाहाबाद इस उनकी उर उर में उसकी एक ओ पागल संसार और कण कण करता करुण कह कहता कहानी का की के को कौन क्या क्यों क्षण गया घन चंचल चल चिर छाया जग जब जलता जाग जाता जाती जाते जीवन जो ज्वाला झरते तम तरल तारक तुम तू तेरा तेरी तेरे तो दिन दुख दे देखो दो न कर नभ नयन नर्तन नव नहीं नित नीरजा नूतन ने पथ पर पल पल पल पलकों पुलक पुलकित प्यार प्रिय फिर बन बन्धन बिन भर भाभ भाभ भी मत मतवाली मधु मधुर मधुशाला मिट मुझे मृदु में मेरा मेरी मेरे मेरे दीपक जल मेरे हों मैं यह युग रहे री रे रोम लघु ले लोचन वह विद्युत् विरह विश्व वीणा सजल सा सिहर सी सुख सुधि सुन्दर से सौरभ स्पन्दन स्मित हँस हग ही हृदय में है हैं हो हौले



