Kaviśrī

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Setu Prakāśana, 1969 - 69 pages
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अनमनी हूँ अपनी अपने अब तक अंचल आधुनिक इन इस उनकी उनके उयोति उस एक और कब कहा मैंने कभी कर करों कवि कविता कविता-संग्रह कविताएँ कविताओं में कवियों कहा मैंने कि का काव्य काव्य में किया किस किसी की की है के केवल को कोई गई गति गया है गीत गीतों चाँदनी चुप रहो छाया छोर जब जल जा जाता जाती जाते जी जी की जी के जीवन की जैसे जो तुम तुमने तुम्हारे तुम्हीं तू तो था थी दिन दूकान दूर देख दो दो सजा नहीं ने पडी पर प्रकार प्रगतिशील प्राण पाया फूल बन बादल बोल भर भी मजदूर मत मन मुझको मुझे मूल्य मेरा मेरी मेरे में मैं यदि यह याद ये रस रह रहा रही रहे रात रुपया रूप लिए ले वह विश्वास वे सदा सब स्वप्न स्वर सुख से हर हिन्दी ही हुई है हैं हो होगी होता हों

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