Dayānanda-Yajurvedabhāshya-bhāskara, Volume 1

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Ārsha Sāhitya Pracāra Ṭrasṭa, 1973 - Vedas

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११ १२ १९ अग्नि अत्र अपने अर्थात् अलङ्कार असि आदि इति इन्द्र इस प्रकार इस मन्त्र की ईश्वर उत्तम उपदेश किया उस एवं और कर करके करता है करते हैं करने वाले करें कर्म का का उपदेश किया है की गई है की व्याख्या शत० के लिए के लिये को को प्राप्त गुणों ग्रहण जगदीश्वर जल जाता है जैसे जो तं तथा ते त्वा धारण नहीं निघं० नित्य ने पठितम् पदार्थ पदार्थों पर परमेश्वर पृथिवी प्रकाशित प्रत्यय प्रादि प्राप प्राप्त भी भौतिक मनुष्य मन्त्र की व्याख्या मन्त्र में महर्षि मा में में की गई मैं यज्ञ यह यहां ये येन योग्य रक्षा रूप लोग वह वा वायु वाला वाली विज्ञान विद्या विद्वानों विद्वान् वेद वेदभाष्य वेदों शब्द शुद्ध सदा सब सा सिद्ध सुख सूर्य से से युक्त स्वाहा हम ही हे है कि हो होता है होने से

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